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सीन 1 – आँगन (दिन)
(बाबू जी खाट पर लेटे हैं, तीनों भाई साथ में बैठे हँस रहे हैं। बहू चुपचाप देखती है।)
बाबू जी – बेटा, इंसान की असली ताक़त पैसा नहीं… भाईचारा होता है। एक अकेला तिनका हवा में उड़ जाता है, लेकिन जब बंडल बन जाए, तो आँधी भी उसे हिला नहीं सकती।
बड़ा भाई – बाबू जी, जब तक हम तीनों भाई हैं, कोई आँधी हमें तोड़ नहीं सकती।
छोटा भाई 1 – हाँ, हम सब एक-दूसरे की ढाल हैं।
छोटा भाई 2 – जब तक साँस चलेगी, भाईचारा यूँ ही बना रहेगा।
(पत्नी मन में बुदबुदाती है – “देखती हूँ कब तक”)
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सीन 2 – रसोई (शाम)
(पत्नी गुस्से में बर्तन पटकती है। बड़ा भाई अंदर आता है।)
पत्नी – सुना आपने? फिर से आपके छोटे भाई पैसे माँग रहे हैं। आप कब तक इन्हें देते रहेंगे?
बड़ा भाई – (शांत स्वर में) वो मेरे भाई हैं। भाई पर शक करके कोई सुखी नहीं हुआ।
पत्नी – देख लेना, आज मेरी बात मज़ाक लगेगी… कल यही बात चुभेगी।
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सीन 3 – गाँव का चौपाल (दिन)
(दोनों छोटे भाई गाँव से बाहर जाते समय बड़े भाई से पैसे लेते हैं।)
छोटा भाई 1 – भैया, हालात तंग हैं, मदद करो।
बड़ा भाई – ले लो… भाई की जेब में जो है, वो तुम्हारा भी है।
पत्नी – (धीरे से) भाई की जेब में क्या तुम्हारी बीवी का हिस्सा नहीं है?
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सीन 4 – रात, घर
(बाबू जी खाँसते-खाँसते गिर जाते हैं, हालत बिगड़ती है।)
बड़ा भाई – ओ राम! बाबू जी की हालत बहुत खराब है।
पत्नी – (तंज कसकर) देखा? मैंने कहा था बचत करो… पर आप तो बस भाइयों पर खर्च करते रहे। अब असली मुसीबत आ गई है।
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सीन 5 – फोन कॉल (सुबह)
(बड़ा भाई छोटे भाइयों को फोन लगाता है)
बड़ा भाई – भाई, बाबू जी की हालत गंभीर है। दवा-इलाज के लिए पैसे चाहिए। जल्दी मदद करो।
छोटा भाई 1 – (कठोर स्वर में) भैया, हम खुद कर्ज़ में हैं।
छोटा भाई 2 – हमें अपने घर-परिवार की चिंता है… बाबू जी के लिए हम कुछ नहीं कर पाएँगे।
(बड़ा भाई फोन हाथ से गिराकर रो पड़ता है)
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सीन 6 – रसोई (भावुक पल)
(पत्नी अलमारी से गहनों का डिब्बा निकालती है)
पत्नी – ये लो मेरे गहने… बेच दो और बाबू जी का इलाज कराओ।
बड़ा भाई – (रोते हुए) नहीं! ये तुम्हारी इज़्ज़त और मायके की निशानी है।
पत्नी – इज़्ज़त तो तब है जब बाबू जी जिंदा रहें। घर के बड़े अगर चले गए तो ये गहने किस काम आएँगे?
बड़ा भाई – (आँसू पोंछते हुए) आज तुमने दिखा दिया कि असली रिश्तेदारी बीवी निभाती है, भाई नहीं।
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सीन 7 – आँगन (अगला दिन)
(बड़ा भाई बाबू जी की दवा के इंतज़ाम में इधर-उधर दौड़ रहा है। पड़ोसी देखते हैं।)
पड़ोसी – अरे, तेरे तो दो और भाई हैं ना? वो कहाँ हैं?
बड़ा भाई – (गहरी साँस लेकर) वो अपने-अपने घर संभालने में व्यस्त हैं। बाबू जी अब सिर्फ मेरे सहारे हैं।
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सीन 8 – बाबू जी का कमरा (रात)
(बड़ा भाई बाबू जी के सिरहाने बैठा है, उनके पाँव दबा रहा है)
बाबू जी – बेटा… तेरा बोझ बहुत बढ़ गया है। तू अकेला सब कैसे संभालेगा?
बड़ा भाई – बाबू जी, जब तक मेरी साँस चलेगी, आपका इलाज रुकने नहीं दूँगा। आप मेरी ताक़त हैं, मेरा सहारा हैं।
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सीन 9 – आँगन (कुछ दिन बाद)
(बाबू जी की हालत सुधरने लगती है। छोटे भाई लौटकर आते हैं।)
छोटा भाई 1 – भैया, हमें माफ़ कर दो। उस दिन स्वार्थ में अंधे हो गए थे।
छोटा भाई 2 – आपने अकेले सब कुछ संभाल लिया। हम भाई कहलाने के लायक नहीं रहे।
बड़ा भाई – भाई कहलाने के लिए जुबान से नहीं, काम से साबित करना पड़ता है।
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सीन 10 – आँगन (अंतिम दृश्य)
(बाबू जी तीनों बेटों के सिर पर हाथ रखते हैं। पत्नी आँगन में खड़ी आँसू पोंछ रही है।)
बाबू जी – बेटा, याद रखना… भाईचारा ही असली दौलत है। पैसा तो मिट्टी है, पर भाई टूट जाएँ तो घर उजड़ जाता है।
(तीनों भाई हाथ जोड़ते हैं, लेकिन बड़ा भाई चुपचाप आँखें नीची करता है। कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है। बैकग्राउंड में भावुक संगीत।)
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👉 इस स्क्रिप्ट में दिल्ली/हॉस्पिटल का ज़िक्र नहीं है, सब गाँव और घर के इर्द-गिर्द है।
इससे वीडियो लंबा भी होगा और दर्शकों का दिल छूने वाला इमोशन भी रहेगा।
क्या आप चाहेंगे कि मैं हर सीन के साथ कैमरा मूवमेंट + बैकग्राउंड म्यूजिक का सुझाव भी लिख दूँ, ताकि ये एकदम फ़िल्मी लगे?
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