संध्या वंदन की विस्तृत विधि (संक्षेप में): #sandhyavandana
संध्या वंदन एक त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) वैदिक अनुष्ठान है, जिसमें आचमन, प्राणायाम, मार्जन, अर्घ्यदान (सूर्य को जल देना), गायत्री मंत्र जप, और उपस्थान मुख्य हैं, जो मन, वचन, कर्म की शुद्धि और परमेश्वर के प्रति समर्पण का भाव जगाते हैं, जिसके लिए शांत स्थान, आसन, जल, धूप-दीप की आवश्यकता होती है और इसे विधि-विधान से, अर्थ समझते हुए करना चाहिए।
संध्या वंदन की विस्तृत विधि (संक्षेप में):
1. तैयारी (शुद्धि):
स्थान और आसन: शांत स्थान चुनें, कुश का आसन लें।
सामग्री: जल पात्र, फूल, चंदन, धूप, दीपक।
तिलक: अपनी परंपरा अनुसार तिलक करें, जैसे ललाट पर "त्र्युषं जमदग्नेः" मंत्र से भस्म लगाएं।
आचमन: 3 बार जल पीते हुए 'ॐ केशवाय नमः', 'ॐ नारायणाय नमः', 'ॐ माधवाय नमः' मंत्र बोलें। 'ॐ गोविंदाय नमः' बोलकर हाथ धोएं, फिर 'ॐ हृषीकेशाय नमः' बोलकर होंठ पोंछें और उंगलियों से मुख, नासिका, नेत्र, कान, नाभि, हृदय, सिर, भुजाओं का स्पर्श करें।
पवित्री धारण: कुश या धातु की अंगूठी पहनें।
2. प्राणायाम और मार्जन (आंतरिक शुद्धि):
प्राणायाम: एकाग्रता के लिए प्राणायाम करें (जैसे 8, 16, 32 मात्राओं
के साथ)।
मार्जन: जल को मंत्रों (जैसे 'ॐ आपोहिष्ठा मयोभुवः') से अभिमंत्रित कर सिर पर छिड़कें (पहले 5 मंत्र सिर पर, 6ठा पैरों पर, 7वां सिर पर)।
3. अर्घ्यदान (सूर्य को नमस्कार):
मंत्र: 'ॐ भूर् भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।' (गायत्री मंत्र)।
क्रिया: जल लेकर सूर्य देव को तीन बार अर्घ्य दें (प्रातः पूर्व, मध्याह्न उत्तर, सायं पश्चिम दिशा की ओर, दिशाओं में अंतर हो सकता है)।
4. गायत्री मंत्र जप:
मंत्र: 'ॐ भूर् भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।'
विधि: श्रद्धा और अर्थ समझते हुए 10, 28, 108 बार जप करें।
5. उपस्थान (सूर्य और देवताओं का आह्वान):
मंत्र: सूर्यदेव और अन्य देवताओं के मंत्रों (जैसे ॐ सूर्याय नमः, ॐ गायत्र्यै नमः) से प्रार्थना करें और उन्हें नमन करें।
6. समापन (समर्पण):
समर्पण: 'अनेन संधि उपासनाखेन कर्मणा श्री परमेश्वर प्रियताम नमः' बोलकर पूरी क्रिया परमेश्वर को समर्पित करें।
शांति पाठ: 'ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः...' जैसे मंत्रों से शांति की प्रार्थना करें।
महत्वपूर्ण बातें:
जल्दबाजी न करें, प्रत्येक क्रिया का अर्थ समझें।
धूप, दीप, कपूर जलाएं, घर का मुख्य दरवाजा खुला रखें।
यह एक दैनिक कर्तव्य है जो मन, वचन और शरीर के पापों से मुक्ति दिलाता है।
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