वैराग्य वाणी
काची देह का पिंजरा, होवे इक दिन राख ।
करना है सो कर लयो, अन्त होवें अनाथ ।।
धन जोबन के मान में, क्यों नर अन्धा होए ।
तेरा कुछ ना जगत में, जाए खाली हाथ बसोए ।।
पुत्तर धीया ना साक संग, ना नाती ना परिवार ।
चले अकेला अन्त को, जब जमराज पुकार ।।
रोता आया जगत में, अन्त को रोता जाए ।
जो जन्मे सो थिर नहीं, सब काल चक्कर में आए ।।
बाल जवानी और जरा, गई सभी को खाए ।
कूड़ा धर भरवास नर, अन्तकाल पछताए ।।
राजा दुःखिया परजा दुःखिया, दुःखिया साध दरवेश ।
देह धारी जो आया, तिन को घना कलेश ।।
क्या धनी क्या दलिद्दरी, क्या राजा क्या रंक ।
चारखानी के जीव को, लागा भय कलंक ।।
सुख की खोजत खोजते, सकल औध वँजाए ।
नानाँ सम्पत पाये के, तो भी तृखा अधिकाए ।।
परवारी भी दुःखिया, निरपरवारी दुःख के माईं ।
गुनी ज्ञानी चतर बुद्ध धारी, तीन काल दुःख पाईं ।।
जाँ से पूछूँ सुख की, पहले देवे रोए ।
अचरज माया भगवान की, सभी जीव दुःख जोए ।।
क्या गृहस्ती क्या विरक्ती, सब घट लागी आग ।
काल करम के जाल में, नित बाँधा अभाग ।।
चौंदह भवन की सम्पत, जो घर आवे मीत ।
तृष्ना मिटे ना बावरी, जो नित दुःख की रीत ।।
आसा माईं जन्मिया, आसा में मर जाए ।
बाँधा आस की जेवड़ी, कोट जून भुगताए ।।
पण्डत ज्ञानी काज़ी आलम, जो देखन में आए ।
मोह माया के चक्कर में, रैन दिन भरमाए ।।
खट-रस व्यंजन नित करे, जीभा नहीं तृपताए ।
छिनभंगुर ये भोग है, कैसे शान्त समाए ।।
इन्द्री विषे विकार में, नित प्यासा होए ।
छिन छिन रंग वटाया, तृपत ना पाए कोए ।।
बालक दुःखिया अन्ध बुद्ध धारी, और दुःखिया जोबनवन्त ।
जरा परापत दुःख की खानी, काल गरासे अन्त ।।
दृश्यमान संसार ये, सब ही रूप वटाए ।
छिनभंगुर जो रूप है, कैसे सुख दिखलाए ।।
करो विचार सुख सार की, मत भूलो मन के भाए ।
‘मंगत’ नौबत चलन की, पल पल बाज बजाए ।।
ओउम ब्रह्म सत्यम सर्वाधार
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आवाज़: प्रेमी नन्द लाल जी बिंद्रा, हल्द्वानी
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