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Скачать или смотреть जातकर्म संस्कारJatakarma sanskar vidhi जातकर्म संस्कार

  • Dr.Kaushlendra Bajpai
  • 2020-07-07
  • 8246
जातकर्म संस्कारJatakarma sanskar vidhi जातकर्म संस्कार
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Описание к видео जातकर्म संस्कारJatakarma sanskar vidhi जातकर्म संस्कार

: हिन्दू धर्म संस्कारों में जातकर्म संस्कार चतुर्थ संस्कार है। गर्भस्थ बालक के जन्म होने पर यह संस्कार किया जाता है - 'जाते जातक्रिया भवेत्।' इसमें सोने की शलाका से विषम मात्रा में घृत और मधु घिस करके बालक को चटाया जाता है। इससे माता के गर्भ में जो रस पीने का दोष है, वह दूर हो जाता है और बालक की आयु तथा मेधाशक्ति को बढ़ाने वाली औषधि बन जाती है। सुवर्ण वातदोष को दूर करता है। मूत्र को भी स्वच्छ बना देता है और रक्त के ऊर्ध्वगामी दोष को भी दूर कर देता है। मधु लाला (लार)-का संचार करता है और रक्त का शोधक होने के साथ-साथ बलपुष्टिकारक भी है



: उत्पन्न हुए बालक के जो कर्म किए जाते हैं, उनको जातकर्म कहा जाता है। इन कर्मों में बच्चे को स्नान कराना, मुख आदि साफ़ करना, मधु और घी आदि चटाया जाता है।, स्तनपान तथा आयुप्यकरण है। इतने कर्म सूतिका घर में बच्चे के करने होते हैं। इसलिये इनको संस्कार का रुप दिया गया है।[1]
शिशु के उत्पन्न हो जाने पर अपने कुल देवता और वृद्ध पुरुषों को नमस्कार कर पुत्र का मुख देखकर नदी-तालाब आदि में शीतल जल से उत्तराभिमुख हो, स्नान करें। यदि मूल-ज्येष्ठा आदि अनिष्ट काल में शिशु उत्पन्न हुआ हो तो मुख देखे बिना स्नान कर लें।


इस संस्कार में पिता समाज को बालक के जन्म की सूचना देता है और कहता है कि-हे बालक मैं तुझ को ईश्वर का बनाया हुआ घृत और शहद चटाता हूँ, जिससे कि तू विद्वानों द्वारा सुरक्षित होकर इस लोक में सौ वर्ष तक धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करें। बालक का जन्म होने के बाद यह संस्कार किया जाता था। होम करने के बाद पिता बालक का स्पर्श करता था और उसे सूँघता था। इसके बाद वह बालक के कान में आशीर्वाद के मंत्र पढ़ता था, जिससे कि बालक दीर्घायु हो और प्रखरबुद्धि वाला हो। बालक को शहद और घी चटाया जाता था


इस घी में सोना भी घिसा जाता था। माता उसे अपने स्तनों से पहली बार दूध पिलाती थी। इसके बाद बालक की नाल काटी जाती थी। आयुर्वेद के अनुसार शहद से पित्त और घी से कफ का शमन होता है और घी और सोने से बुद्धि प्रखर होती है। इस संस्कार का प्रमुख उद्देश्य बालक को स्वस्थ और प्रखरबुद्धि वाला बनाना था।


जातकर्म संस्कार के प्रमुख उपांग हैं :- मेधाजनन, प्रसूतिकाहोम, आयुष्यकरण, अंसाभिमर्षण, पंचब्राह्मणस्थापन, मात्र्यभिमंत्रण, स्तनप्रतिधान व प्रतिरक्षात्मक अनुष्ठान। इनका विवरण निम्न रुपों में पाया जाता है :

शिशु के जन्म के साथ ही उसका पिता नाभिनाल के छेदन से पूर्व ही एक संस्कार करता था, जिसे "जातकर्म संस्कार' कहा जाता था। इसके दो भाग होते थे, जिन्हें "मेधाजनन' तथा "आयुष्य' अथवा "आयुष्यकरण' कहा जाता था। आयुष्य के अंतिम भाग को "बल' भी कहा जाता था। इनका विवरण गृह्यसूत्रों में प्राप्त होता है,

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