सम्पूर्ण ईश्वरीय रहस्य: कलियुग के अंत से सतयुग के स्वर्णिम उदय तक का सफर
ब्रह्माकुमारीज़ ज्ञान के अनुसार, 5000 वर्ष का यह सृष्टि चक्र अपने अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव—संगमयुग (Confluence Age)—से गुजर रहा है। यह वह समय है जब पुरानी, पतित कलियुगी दुनिया का परदा गिरता है और नई, 16 कला संपूर्ण सतयुगी दुनिया का मंच सजता है। यह परिवर्तन कोई रातों-रात होने वाला जादू नहीं है, बल्कि परमपिता परमात्मा शिव द्वारा निर्देशित एक बेहद सूक्ष्म, सटीक और सुनियोजित आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
1. सतयुग: एक 16 कला संपूर्ण स्वर्णिम दुनिया
सतयुग (Golden Age) 1250 वर्ष की वह सर्व-पवित्र दुनिया है, जहाँ प्रकृति और मनुष्य दोनों अपनी 'सतोप्रधान' (Highest Purity) अवस्था में होते हैं।
सामाजिक व आर्थिक स्थिति: यहाँ एक धर्म (आदि सनातन देवी-देवता धर्म), एक राज्य और एक भाषा होती है। समाज पूरी तरह से अपराध-मुक्त, पुलिस-मुक्त और कर-मुक्त (Tax-free) होता है। महल सोने-हीरों से जड़े होते हैं और प्रकृति सदा वसंत ऋतु के समान सुखदायी होती है।
शारीरिक व आध्यात्मिक स्थिति: देवताओं की आयु लगभग 150 वर्ष होती है और उनका शरीर 'कंचन काया' (स्वस्थ और निरोगी) होता है। अकाल मृत्यु नहीं होती; आत्मा खुशी-खुशी पुराना शरीर छोड़कर नया धारण करती है।
कर्मों की गति (Law of Karma): सतयुग में कोई पाप या पुण्य नहीं होता। वहाँ किए गए कर्म 'अकर्म' कहलाते हैं क्योंकि आत्मा पूर्णतः आत्म-अभिमानी और निर्विकारी होती है। देवताएँ संगमयुग की तपस्या का 'प्रारब्ध' (Reward) भोगते हैं, इसलिए वहाँ कर्म करना कोई मेहनत नहीं, बल्कि एक उत्सव होता है।
2. सत्ता का हस्तांतरण: सेना से शिव शक्ति सेना तक
कलियुग के बिल्कुल अंत में जब हाहाकार मचेगा, प्राकृतिक आपदाएँ आएँगी और परमाणु युद्ध छिड़ेगा, तब राजनेताओं के हाथ से सत्ता निकल जाएगी और दुनिया में मिलिट्री शासन (Martial Law) लागू हो जाएगा।
हथियारों से लैस स्थूल सेना जब इस विनाश को रोकने में बेबस हो जाएगी, तब दुनिया के सामने 'शिव शक्ति सेना' (तपस्वी ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ) प्रत्यक्ष होगी।
ये योगी आत्माएँ बिना किसी हथियार के, एक स्थान पर बैठकर अपने योगबल से पूरे विश्व को 'सकाश' (Spiritual Vibrations) देंगी। यह सकाश उग्र प्रकृति को शांत करेगा और शरीर छोड़ रही तड़पती आत्माओं को परमशांति व मुक्ति का अनुभव कराएगा।
स्थूल सेना के सेनापति इन तपस्वी आत्माओं की रूहानी शक्ति को पहचानेंगे, उन्हें सैल्यूट करेंगे और प्रतीकात्मक रूप से विश्व की सत्ता (Globe) उन्हें सौंप देंगे।
3. 'एडवांस पार्टी': नई दुनिया के गुप्त निर्माता
जब संगमयुग पर शिव शक्ति सेना अपनी तपस्या कर रही होती है, उसी समय एक दूसरी रूहानी टीम—एडवांस पार्टी—गुप्त रूप से नई दुनिया का बुनियादी ढाँचा तैयार कर रही होती है।
ये वे श्रेष्ठ संगमयुगी तपस्वी आत्माएँ (जैसे मातेश्वरी जगदम्बा/मामा) हैं, जो संपूर्णता से पहले अपना शरीर छोड़कर कलियुग के अंत में सात्विक और बेहद संपन्न राजघरानों में जन्म लेती हैं।
इनका मुख्य कार्य सतयुग के पहले राजकुमार (श्री कृष्ण) के जन्म के लिए पवित्र माता-पिता, रिश्तेदार और भौतिक संपदा (महल आदि) तैयार करना है।
एडवांस पार्टी और शिव शक्ति सेना का पहला सूक्ष्म मिलन विनाश के समय दिव्य दृष्टि द्वारा होता है, और स्थूल मिलन सतयुग में नए शरीरों और नए ईश्वरीय रिश्तों के साथ होता है।
4. श्री कृष्ण का अलौकिक जन्म (विश्व का पहला पत्ता)
सतयुग के पहले राजकुमार श्री कृष्ण की आत्मा स्वयं 'प्रजापिता ब्रह्मा' (ब्रह्मा बाबा) की आत्मा है, जो अपनी संपूर्ण 'कर्मातीत' अवस्था प्राप्त कर सूक्ष्म वतन से नीचे अवतरित होती है।
उनके माता-पिता एडवांस पार्टी की वे उच्च आत्माएँ होती हैं, जो विनाश के समय शिव बाबा की टचिंग से पूर्ण निर्विकारी अवस्था में पहुँच जाती हैं।
श्री कृष्ण का जन्म शारीरिक आकर्षण (विकार) से नहीं, बल्कि 'योगबल' (Power of Pure Thoughts) के माध्यम से होता है।
माता का गर्भ उनके लिए 'गर्भ जेल' नहीं, बल्कि 'गर्भ महल' के समान अतीन्द्रिय सुख देने वाला होता है। उनके अवतरण के साथ ही प्रकृति झूम उठती है और सतयुग की आधिकारिक शुरुआत (संवत 1) होती है। इसके बाद, संगमयुग के नंबरवार पुरुषार्थ के अनुसार बाकी 9 लाख आत्माएँ परमधाम से धीरे-धीरे नीचे उतरती हैं।
5. सतयुग का वीज़ा: ईश्वरीय मर्यादाएँ और शर्तें
इस स्वर्णिम दुनिया में प्रवेश पाने के लिए केवल इच्छा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संगमयुग पर मनुष्य से देवता बनने की पढ़ाई पढ़नी पड़ती है। इसके मुख्य नियम इस प्रकार हैं:
ईश्वरीय पहचान: 7 दिवसीय राजयोग कोर्स द्वारा स्वयं को आत्मा और शिव को परमात्मा मानना।
संपूर्ण पवित्रता (Brahmacharya): मन, वचन और कर्म से कलियुगी विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) का पूर्ण त्याग।
शुद्ध आहार: पूर्ण रूप से सात्विक भोजन ग्रहण करना (मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का पूर्ण निषेध) और उसे परमात्मा की याद में स्वीकार करना।
ईश्वरीय दिनचर्या: रोज़ सुबह 'अमृतवेला' (4:00 - 4:45 AM) का शक्तिशाली योग और प्रतिदिन 'मुरली' (ईश्वरीय महावाक्य) का अध्ययन करना।
चार स्तंभों का पालन: ज्ञान को समझना, राजयोग का निरंतर अभ्यास करना, दैवीय गुणों की धारणा करना और दूसरों को यह आध्यात्मिक संदेश देकर ईश्वरीय सेवा करना।
यह महा-परिवर्तन का समय चल रहा है जहाँ पुरानी दुनिया विदाई ले रही है और नई दुनिया की भोर होने ही वाली है। परमपिता परमात्मा का यह ईश्वरीय निमंत्रण हर उस आत्मा के लिए है जो स्वयं को पहचान कर इस ईश्वरीय कार्य में अपना भाग्य बनाना चाहती है।
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