महाशिवरात्रि के इस पावन पर्व पर, भगवान शिव की अनोखी बारात और माता पार्वती की हृदयस्पर्शी विदाई का एक दिव्य अनुभव। यह गीत आपको महादेव की भक्ति में सराबोर कर देगा।
विशेष: शिव विवाह और विदाई की अनसुनी पंक्तियाँ।
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"न आदि न अंत है जिसका, वो अविनाशी आया है,
हिमाचल की गोद से, अपनी शक्ति लेने आया है।
आज मसान की भस्म भी, कुमकुम से महक उठी,
त्रैलोक्य का स्वामी आज, दूल्हा बन के आया है।"
गूँज उठा आकाश, धरा भी हरषाई है,
महाकाल के संग में, गौरा मैया की विदाई है।
शून्य से शिखर तक, बस शिव ही शिव छाए हैं,
मृत्युंजय आज स्वयं, पाणिग्रहण को आए हैं।
शीश पे अमृत चंद्र, जटा में गंगा की धारा,
नीलकंठ की आभा ने, मोह लिया जग सारा।
तन पे दिव्य भस्म की चादर, ओढ़े दिगंबर आए,
कर में डमरू खनके, पग-पग अमृत बरसाए।
सौ सूर्यों का तेज समाया, उस भाल के चंदन में,
झुक गए देव-धनुज सब, भोले के इस अभिनंदन में।
भूत, प्रेत, बैताल संग में, नंदी का हुंकार है,
महाकाल की टोली में, मगन सारा संसार है।
कोई विकराल, कोई निराकार, कोई रुद्र का अंश है,
नाच रहे सब मस्त मगन, मिटा काल का वंश है।
डमरू बोले 'धुिन-धुिन', शंखों का नाद प्रचंड हुआ,
शिव की मस्ती के आगे, ब्रह्मांड भी अखंड हुआ!
छोड़ चलीं सुकुमारि गौरा, महलों का ऐश्वर्य सारा,
थाम लिया जोगी का हाथ, छोड़ पिता का द्वारा।
मैना मैया व्याकुल होकर, आँचल में मुँह ढाँपती,
"बेटी! कैसे रहेगी वहाँ?" सोच के रूह काँपती।
गौरा बोलीं— "माँ! शिव ही मेरा श्रृंगार हैं,
वो स्मशान के वासी नहीं, मोक्ष का द्वार हैं।"
विदाई नहीं ये, ये तो प्रकृति का पुरुष से मिलन है,
शिव-शक्ति के संगम से, तृप्त हुआ हर मन है।
गौरा चलीं कैलाश, शिव के वाम अंग विराजीं,
देख के ये अनुपम जोड़ी, दुनिया हुई राजी!
हर-हर महादेव... गूंजे अब आठों याम,
गौरा चलीं पिया के संग, शिव-शक्ति को प्रणाम।
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