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Скачать или смотреть जलियांवाला बाग की याद दिलाता शहीद गांव रोहनात का कुआ ( Rohnat - A Freedam fighter village )

  • शहीद गांव रोहनात - Rohnat
  • 2018-02-12
  • 249
जलियांवाला बाग की याद दिलाता शहीद गांव रोहनात का कुआ ( Rohnat - A Freedam fighter village )
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Описание к видео जलियांवाला बाग की याद दिलाता शहीद गांव रोहनात का कुआ ( Rohnat - A Freedam fighter village )

Rohnat, ( Bhiwani ), ( Haryana )

Rohnat - A Freedam fighter village

रोहनात के रणबांकुरों की कहानी -

देश की आजादी में हरियाणा के जिन वीर सपूतों ने अपना अहम योगदान दिया, उन वीर सपूतों में भिवानी जिले के गांव रोहनात के लोगों के भी नाम शुमार हैं।
29 मई 1857 को रोहनात गांव के वीर जांबाजों ने बहादुरशाह के आदेश पर अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी। ग्रामीणों ने जेलें तोड़कर कैदियों को आजाद करवाया। 12 अंग्रेजी अफसरों को हिसार व 11 को हांसी में मार गिराया।
इससे बौखलाकर अंग्रेजी सेना ने गांव पुट्‌ठी के पास तोप लगाकर गांव के लोगों को बुरी तरह भून दिया। सैकड़ों लोग जलकर मर गए, मगर फिर भी ग्रामीण लड़ते रहे। इतना ही नहीं इसके बाद भी अंग्रेजों ने जुल्म-ओ-सितम जारी रखे। औरतों व बच्चों को कुएं में फेंक दिया। दर्जनों लोगों को सरेआम जोहड़ के पास पेड़ों पर फांसी के फंदे पर लटका दिया।
इस गांव के लोगों पर अंग्रेजों के अत्याचार की सबसे बड़ी गवाह हांसी की एक सड़क है। इस सड़क पर बुल्डोजर चलाकर इस गांव के अनेक क्रांतिकारियों को कुचला गया था, जिससे यह रक्तरंजित हो गई थी और इसका नाम लाल सड़क रखा गया था।
ग्रामीणों के अनुसार देश की आजादी के आंदोलन में सबसे अधिक योगदान के बावजूद उनके साथ जो हुआ, उसकी कसक आज भी उनके दिल में  है। 14 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने इस गांव को बागी घोषित कर दिया व 13 नवंबर को पूरे गांव की नीलामी के आदेश दे दिए गए।
20 जुलाई 1858 को गांव की पूरी 20656 बीघे जमीन व मकानों तक को नीलाम कर दिया गया। इस जमीन को पास के पांच गांवों के 61 लोगों ने महज 8 हजार रुपए की बोली में खरीदा। अंग्रेज सरकार ने फिर फरमान भी जारी कर दिया कि भविष्य में इस जमीन को रोहनात के लोगों को न बेचा जाए।
धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो गई और यहां के लोगों ने अपने रिश्तेदारों के नाम कुछ एकड़ जमीन खरीदकर दोबारा गांव बसाया, मगर लोगों को मलाल आज भी है कि देश की आजादी के लिए अपना सबकुछ खो देने के बावजूद उन्हें वो जमीन तक नहीं मिली, जिसके लिए आज तक लड़ाई लड़ रहे हैं।

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