Indore Water Death | जब पानी बना ज़हर | इंदौर की चुप्पी और सिस्टम की नाकामी | KATV Bharath
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बचपन से हमें सिखाया जाता है, जल ही जीवन है। हमारे शरीर का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से बना है। लेकिन सोचिए, अगर यही पानी ज़हर बन जाए तो? आज हम बात कर रहे हैं उस इंदौर की, जिसे देश का सबसे साफ शहर कहा जाता है, लेकिन जहां बीते एक हफ्ते में पानी पीने से कम से कम 14 लोगों की मौत हो चुकी है, और 150 से ज़्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हैं। इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में नल से आने वाले साफ पानी में
सीवर का गंदा पानी मिल गया। नतीजा? उल्टी, दस्त, संक्रमण, और देखते ही देखते मौतें। आधिकारिक आंकड़ों में मौतों की संख्या 4 बताई जा रही है, मेयर और मंत्री 7 से 9 की बात कहते हैं, लेकिन स्थानीय मीडिया और ज़मीनी सच्चाई कम से कम 14 मौतों की पुष्टि कर रही है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ड्रिंकिंग वॉटर पाइपलाइन में कई जगह लीकेज था। इसी पाइपलाइन के ऊपर एक टॉयलेट बना दिया गया, वो भी बिना सेफ्टी टैंक के। यानी गटर का पानी सीधे पीने के पानी में मिल रहा था। यह कोई एक दिन की गलती नहीं थी। डेढ़ से दो साल से लोग शिकायत कर रहे थे, पानी कड़वा है, बदबू आ रही है। अगस्त 2024 में नई लाइन का टेंडर भी निकला, लेकिन काम शुरू ही नहीं हुआ। इस हादसे में 5 महीने के आव्यान साहू की मौत हो गई। 10 साल के इलाज और 9 महीने के बेड रेस्ट के बाद उसकी मां साधना साहू ने उसे जन्म दिया था। दूध गाढ़ा था,
इसलिए उसमें नल का पानी मिलाया गया, और वही पानी बच्चे के लिए ज़हर बन गया। 75 साल के नंदलाल पाल, 50 साल की सीमा प्रजापत, 29 साल की उमा कोरी, सबकी जान उसी नल के पानी ने ली, जिसे हम सबसे सुरक्षित मानते हैं। जब लोग मर रहे थे, तब इलाके के पार्षद झूला झूल रहे थे। जल विभाग के प्रभारी कार्यक्रमों में व्यस्त थे। नगर निगम, अधिकारी, मंत्री, सब खामोश थे। पहली मौत 26 दिसंबर को हुई, लेकिन प्रशासन हरकत में तब आया जब मामला सुर्खियों में आया। मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय जब सवाल पूछे गए तो उन्होंने इसे “फोकट का सवाल” कहा, और अपशब्दों का भी इस्तेमाल किया। बाद में सोशल मीडिया पर माफी मांगी, और 1 जनवरी को इलाके में पहुंचे। ₹2 लाख के चेक देने की कोशिश की, लेकिन कई पीड़ित परिवारों ने लेने से मना कर दिया। उनका सवाल था, जब हम शिकायत कर रहे थे, तब आप कहां थे? कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल मुख्यमंत्री और मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। आरोप है कि मौतों के आंकड़े छुपाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दोषियों पर कार्रवाई और ₹2 लाख मुआवजे का ऐलान किया है। लेकिन सवाल यही है, क्या पैसों से किसी की जान की भरपाई हो सकती है? यह हादसा नहीं, आपराधिक लापरवाही है। जब शिकायतें पहले से थीं, तो मौतों का इंतज़ार क्यों किया गया? जब लोग मर रहे थे, तो सिस्टम क्यों सोया रहा? देश के सबसे साफ शहर में अगर पानी ही जान ले ले, तो यह सिर्फ इंदौर का सवाल नहीं, पूरे सिस्टम पर सवाल है। हम सवाल पूछते रहेंगे, क्योंकि सवाल पूछना ही जवाबदेही तय करने का एकमात्र रास्ता है।
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