समय का चक्र बड़ा बलवान है इतिहास अपने आप को दोहराता है अगर आप इतिहास से नहीं सीखते है तो आप को इतिहास बनते समय नहीं लगता नब्बे के दशक मैं जब रामजन्मभूमि आंदोलन अपने पीक पर था तो मंडल कमीशन की शिफारिश लागू कर एक बड़े हिंदू वर्ग को सामाजिक समरसता के आयाम मैं लाया गया और इस तरह राम जन्मभूमि आंदोलन की हवा निकल दी गई। आज जब हिंदुत्व की विचार हिंदुत्व के केंद्र बिंदु के इर्द गिर्द वर्तमान राजनीति की प्रयोगशाला बनी है तब यूजीसी के नोटिफिकेशन एक महत्वपूर्ण फैसला है.पक्ष और विपक्ष सब इसी में उलझे है, कोई अर्थव्यवस्था हेल्थ एजुकेशन पर बात नहीं करता। सच्चाई यह है की हम टॉप यूनिवर्सिटी रैंकिंग मैं कहा है चाइना की jhongjhu यूनिवर्सिटी ने ऑक्सफोर्ड को टॉप रैंकिंग में पीछे कर दिया कहीं कोई चर्चा नहीं है कि सरकार के 11 साल के बाद भी हमारी यूनिवर्सिटी टॉप 100 मैं क्यों नहीं है या 200 में भी क्यों नहीं है ? सारी चर्चा इस बात पर टिक गई है की समानता की व्यवस्था यूनिवर्सिटी मैं लागू होनी चाहिए, होना भी चाहिए, मैं भी इसका समर्थक हूँ , पर मैं पूछना चाहता हूँ की वर्तमान समय मैं आरक्षण की व्यवस्था के लागू हुए इतने दिन हो गए लेकिन शोषक और सोशित की परिभाषा नहीं बदली.एससी कम्युनिटी एवं एसटी कम्युनिटी के खिलाफ एट्रोसिटी के बड़े मामले समाज के जिस हिस्से आते है उस को भी सोशित मान लिया जाना न्यायमूलक तो कतई नहीं है। यूजीसी की स्थापना 1944 मैं सार्जेंट कमीशन की रिपोर्ट पर अंग्रजों ने बनाई थी उसका काम था परफॉरमेंस के आधार पर यूनिवर्सिटी कॉलेज को आथिक सहायता पहुचना। पर यूजीसी कब विधायी संस्था बन गया पता ही नहीं चला।
पर हाल मैं यूजीसी की नोटिफिकेशन मैं एससी एसटी ओबीसी हैडिकैप्ड फीमेल को संभावित सोशित की श्रेणी मैं रखा गया है शोषक के रूप मैं जनरल केटेगरी को यह अच्छा भी है। होना भी चाहिए, सरकार का स्वागत युक्त कदम है जनरल केटेगरी डिज़र्व्स इट। हमारे प्रतिनिधियों को सांप लोट गया है करे तो करे क्या लेकिन मूल बात यह है कि ज्यादातर के बच्चे दूसरे विकसित देशों के यूनिवर्सिटी मैं पढ़ते है ऐसे मैं क्या ही फ़र्क़ पड़ता है।
एससी/एसटी कम्युनिटी के लोग इस बात को लेकर खुश है की उनको जातिगत लिंग आधारित भेदभाव के विरुद्ध एक प्रोटेक्शन मिला है।
ओबीसी खुश है की उनको भी एससी/एसटी के साथ प्रोटेक्शन मिल गया और एससी/एसटी के साथ आ जाने से वो अब इसके शिकार नहीं हो पाएंगे। क्योंकि एट्रोसिटी की सबसे ज़्यादा केस उन्ही के ख़िलाफ़ है
अब मेरा सवाल है एससी एसटी कम्युनिटी से की आपके पास तो पहले से प्रोटेक्शन था तो इस एट्रोसिटी एक्ट के अनुसर अब जब यूनिवर्सिटी मैं ओबीसी को भी वही अधिकार मिल जाएगा तो क्या आप ओबीसी के अगेंट्स कंप्लेन कर पाओगे क्योंकि वो भी आप आप ही के साथ है नोटिफिकेशन के अनुसार.यानी शोषित शोषित के ख़िलाफ़ कुछ करे तो क्या कंप्लेन होगा.
एक बड़ा सवाल और भी है की भारतीय समाज मैं दलित शब्द हिंदुओं तक सीमित है ऐसे मैं ओबीसी -मुस्लिम एससी एसटी क्रिश्चियन जो रिजर्व्ड केटेगरी का लाभ ले रहे है उनको भी ये सुविधा मिली हुई है
बाक़ी बस इतना ही कहना है कि हम काटे गए क्योंकि हम समय के अनुसार बदले नहीं आपने रियासते माँगी हमने दे दी आपने जमीं माँगी हमने दे दी आपने जो मांगा हमने दिया अब कम से कम आत्मसम्मान तो रहने दो.एक आम जनरल केटेगरी पर कुछ तो रहम करे सरकार.किसी भी समाज को दलित करने का एक लिमिट होता है.आगे महामानव जो उचित समझे तोफ़ा क़बूल है
Why in News?
The University Grants Commission has notified the University Grants Commission (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026, aimed at tackling caste-based discrimination in higher education institutions (HEIs).
What are the Key Provisions of the UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026?
Broad Coverage of Caste-Based Discrimination: The regulations define caste-based discrimination as any unfair or biased treatment against Scheduled Castes (SCs), Scheduled Tribes (STs), and Other Backward Classes (OBCs), thereby explicitly extending legal protection to OBCs and correcting a major omission in the earlier draft framework.
Expanded Definition of Discrimination: Discrimination is defined as any unfair, biased, or differential treatment, whether explicit or implicit, on grounds such as caste, religion, race, gender, place of birth, or disability, including acts that impair equality in education or violate human dignity.
Mandatory Equal Opportunity Centres (EOCs): Every higher education institution is required to establish an Equal Opportunity Centre (EOC) to promote equity, social inclusion, and equal access, and to address complaints related to discrimination on campus.
Each institution must form an Equity Committee under the EOC, chaired by the head of the institution, with mandatory representation from SCs, STs, OBCs, persons with disabilities, and women, ensuring inclusive decision-making.
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