“Mohabbat?” is a raw and introspective Hindi rap that questions the idea of love in a world where trust has a price and emotions come with conditions. The song reflects the moment when illusions break, promises feel hollow, and silence becomes the biggest teacher. 🌆💭
This track is for those who have been hurt, learned the truth the hard way, and chose self-respect over fake connections. It talks about emotional awakening, closed hearts, and standing strong after disappointment. If you connect with Hindi rap, heartbreak rap, realistic lyrics, and songs about modern relationships and inner conflict, this song will resonate deeply. 🖤🔥
Simple emotions. Honest truth.
Let the city speak and the silence sink in. 🎧
💔 For those who felt it
🌙 Best experienced alone
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🎶 Song Lyrics
[प्रस्तावना | बोलकर | धीमी आवाज़]
मोहब्बत?
शहर ने सिखाया — भरोसा सबसे महँगा सौदा है।
[अंतरा 1 | आक्रामक रैप]
दिल काँच नहीं था, फिर भी टूट गया
वायदों का वज़न था, पर सच छूट गया
चेहरे पे मुस्कान, भीतर हिसाब था
मैं सच्चा था शायद, यही मेरा ख़िताब था
साथ तब थे जब सब ठीक-ठाक था
गिरा तो पता चला हर रिश्ता नक़ाब था
रोया नहीं मैं, बस समझ गया
दर्द वहीं आता है जहाँ उम्मीद ज़िंदा था
[हुक | समूह स्वर | कठोर]
ना प्यार, ना भरोसा, बस सबक मिले
दिल बंद, शहर खुला, हम हथियार बने
ना आँसू, ना संदेश, बस ख़ामोशी चले
मोहब्बत मर चुकी, हम अब भी खड़े
[अंतरा 2 | कच्चा फ्लो]
तू बोली “हमेशा”, पर वक़्त पलट गया
मैं असली था, पर तेरा रंग बदल गया
साथ चलना था, पर तुझे दौड़ पसंद
मैं ठहरा रहा, तू किसी और की संग
यहाँ जज़्बात नहीं, यहाँ सौदे होते हैं
दिल गिरवी रखे जाते हैं, किस्तों में रोते हैं
मैं टूटा नहीं था, बस धोखा खा गया
अब जेब भरी है, पर दिल पत्थर सा हो गया
[हुक | समूह स्वर | और कड़ा]
ना प्यार, ना भरोसा, बस सबक मिले
दिल बंद, शहर खुला, हम हथियार बने
ना आँसू, ना संदेश, बस ख़ामोशी चले
मोहब्बत मर चुकी, हम अब भी खड़े
[सेतु | आधी गति | बोलता रैप]
ये दिल टूटना नहीं था,
ये हक़ीक़त की चेतावनी थी।
लोग साथ तभी चलते हैं
जब तुम उनके काम आते हो।
[अंतरा 3 | आत्मविश्वासी | ठंडी आवाज़]
अब “मुझे याद है तू” बस शोर लगता है
जो छोड़ गए, उनका नाम बोझ लगता है
मैं बदला नहीं, बस जाग गया
प्यार अंधा नहीं, अंधापन गुनाह बन गया
अब ध्यान लक्ष्य पर, यादों पर नहीं
शहर मेरा साथी, मैं रातों का सही
तू कहानी थी, जो यहीं खत्म हुई
मैं किताब हूँ, हर दिन नई लिखी हुई
[समापन | शांत | अंतिम पंक्तियाँ]
मोहब्बत से नफ़रत नहीं,
बस अब दरवाज़ा बंद है।
जो बिना मतलब साथ चले,
शायद वो किसी और शहर में है।
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