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Скачать или смотреть Ep82: Jain Darshan: Man, Soch aur Antarik Yatra | Indriyaan Man Ko Kaise Disha Deti Hain ?

  • JINVANI SHORTS 🇮🇳
  • 2026-01-06
  • 4339
Ep82: Jain Darshan: Man, Soch aur Antarik Yatra | Indriyaan Man Ko Kaise Disha Deti Hain ?
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Описание к видео Ep82: Jain Darshan: Man, Soch aur Antarik Yatra | Indriyaan Man Ko Kaise Disha Deti Hain ?

जय जिनेन्द्र।
हमारी श्रृंखला
“जैन दर्शन: मन, सोच और आंतरिक यात्रा”
में आपका स्वागत है।

इस श्रृंखला के दूसरे भाग में
हम पिछले प्रश्न को आगे बढ़ाते हैं —
“इन्द्रियाँ मन को कैसे दिशा देती हैं?”

हम रोज़ देखते हैं, सुनते हैं,
स्वाद लेते हैं, स्पर्श करते हैं
और अनुभव करते हैं।
लेकिन हम शायद ही कभी रुककर यह सोचते हैं कि
ये अनुभव
हमारे मन तक कैसे पहुँचते हैं
और हमारी सोच को किस दिशा में मोड़ देते हैं।

जैन दर्शन
इसी बिंदु पर
एक गहरा और सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

जैन दर्शन के अनुसार
मन अकेला कार्य नहीं करता।
जो कुछ भी मन में चलता है,
उसके पीछे
इन्द्रियों के माध्यम से आने वाला संपर्क
एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस भाग में
हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि
इन्द्रियाँ
मन को क्या देती हैं,
कितनी देती हैं
और कहाँ तक उनकी भूमिका सीमित है।

यह चर्चा
किसी निष्कर्ष को थोपने के लिए नहीं है,
बल्कि
अपने अनुभवों को
शांत भाव से समझने का प्रयास है —
ताकि यह स्पष्ट हो सके कि
हमारी सोच
हमारे नियंत्रण में क्यों नहीं रहती
और
वह किस प्रक्रिया से आकार लेती है।

इस एपिसोड में हम समझेंगे —

Chapters —

00:00 Intro

[00:02:51] इंद्रियाँ (Senses) क्या हैं: ये जानने-देखने वाली शक्ति नहीं, बल्कि आत्मा और बाहरी दुनिया के बीच एक पुल (Bridge) या माध्यम हैं।

[00:04:32] डाकिया का उदाहरण: इंद्रियाँ उस डाकिया की तरह हैं जो चिट्ठी (सूचना) लाती हैं; उस चिट्ठी को पढ़कर खुश या दुखी होना घर के मालिक (मन/आत्मा) का काम है।

[00:05:37] मन vs इंद्रियाँ: इंद्रियाँ दरवाजे की तरह हैं (बाहरी संपर्क), और मन घर के भीतर का माहौल है (भीतरी प्रतिक्रिया)।

[00:08:51] जिम्मेदारी किसकी: इंद्रियाँ केवल अवसर (Opportunity) बनाती हैं, उस अवसर पर प्रतिक्रिया करना मन की जिम्मेदारी है; इंद्रियाँ दोषी नहीं हैं।

[00:11:50] मिठाई की दुकान: आँख ने मिठाई देखी (संपर्क), पर खाना है या नहीं (दिशा), यह मन की भीतरी अवस्था (भूख/डॉक्टर की मनाही) पर निर्भर करता है।

[00:12:46] पहली आंतरिक प्रक्रिया: इंद्रिय संपर्क के बाद पहली चीज़ 'पसंद-नापसंद' नहीं, बल्कि 'बोध' (Awareness) होती है — सिर्फ यह जानना कि कुछ है।

[00:16:04] अनुभव तटस्थ (Neutral) होते हैं: हॉर्न की आवाज़ अपने आप में परेशान नहीं करती; अगर वह किसी अपने की गाड़ी का हो तो वही आवाज़ खुशी देती है। लेबल मन लगाता है।

[00:18:30] बंधन कहाँ है: बंधन इंद्रियों या विषयों में नहीं, बल्कि मन की उस आदत में है जो विषयों में चिपक (Attach) जाती है।

[00:21:37] जानना vs रमना: जब तक मन सिर्फ 'जान' रहा है (कैमरे की तरह), वह मुक्त है; जब वह उसमें 'रमने' (Involve) लगता है, तब दिशा बदलती है (इंस्टाग्राम का उदाहरण)।

[00:23:49] खाली जगह (The Gap): जिम्मेदारी संपर्क के वक्त नहीं, बल्कि उसके तुरंत बाद वाले छोटे से गैप में शुरू होती है जहाँ मन चुनाव करता है।

[00:26:31] उबलता पानी: मन का गुस्सा/विचलन पानी के उबलने जैसा है — यह व्यावहारिक अवस्था है, पानी का मूल स्वभाव (शीतलता) नहीं।

[00:25:34] दोषारोपण बंद: इस समझ से इंसान अपनी अशांति के लिए बाहरी दुनिया या इंद्रियों को दोष देना बंद कर देता है और मन की दिशा पर ध्यान देता है।



हम अभी सीखने का प्रयास कर रहे हैं,
और जो भी समझ साझा कर रहे हैं,
वह अध्ययन और मनन पर आधारित है।
उद्देश्य केवल इतना है कि
जैन दर्शन की गहराई
आज की भाषा में
सहज रूप से समझी जा सके।

📚 शोध व स्रोत (Research & References):
इस एपिसोड में दी गई सारी जानकारी
केवल जैन शास्त्रों और आचार्य–ग्रंथों पर आधारित है।
किसी भी बाहरी दर्शन,
आधुनिक मनोविज्ञान
या अन्य धर्मग्रंथ का उपयोग नहीं किया गया है।

👉 मुख्य संदर्भ ग्रंथ:
तत्त्वार्थसूत्र — आचार्य उमास्वामी
समयसार — आचार्य कुंदकुंद
नियमसार / पंचास्तिकाय — आचार्य कुंदकुंद
गोम्मटसार (जीवकाण्ड) — सीमांकन एवं वैचारिक पुष्टि हेतु

आवश्यक स्थानों पर
शास्त्रीय सीमा की पुष्टि के लिए
तत्त्वार्थसूत्र की पारंपरिक टीका
संदर्भ रूप में देखी गई है।

मन और इन्द्रियों के संबंध को समझने के बाद
अब एक और प्रश्न
स्वाभाविक रूप से सामने आता है
यदि अनुभव इन्द्रियों से आते हैं
और मन उन्हें ग्रहण करता है,
तो फिर
विचार कहाँ से पैदा होते हैं?
यही प्रश्न
हमें अगले भाग की ओर ले जाता है

भाग 3 —
“विचार कहाँ से पैदा होते हैं?”
विचार कैसे बनते हैं,
कुछ विचार क्यों टिकते हैं
और कुछ क्यों नहीं।
इसी विषय पर
हम अगले भाग में
संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से
चर्चा करेंगे।
ज़रूर सुनिए।

🎧 Podcast Series Info:
श्रृंखला / Podcast:
Jain Darshan: Man, Soch aur Antarik Yatra
भाग: 2 (Ep82)
🔹 Presented by: Rushabh Jain & Jinvani Shorts
🔹 Research & Script: Jain Shastras based study
🔸 Narration: AI Voice (Directed by Rushabh Jain)
🔸 Editor: Rushabh Jain
✅ 100% Original content — researched, written & produced by our team.

यह वीडियो हमारी स्वयं की अध्ययन-प्रक्रिया पर आधारित है।
सभी शोध, लेखन और सामग्री का संकलन
हमने अपने प्रयास से किया है।
हम अभी सीखने की कोशिश कर रहे हैं
और जैन दर्शन को
सरल भाषा में समझने का प्रयास कर रहे हैं।

📅 नया भाग क्रमबद्ध रूप से जारी किया जाएगा।
इसलिए जुड़े रहिए
इस आंतरिक यात्रा के अगले चरण के साथ।


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जय जिनेन्द्र।

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