voice and composition - Dr. Vijaya Godbole
music arrangement and recording - Sandeep Singh
video making - Anoushka Godbole
जो देवी षडधार कमल में स्थित हैं, तेजोमय होकर सुषुम्ना मार्ग के मध्य में अत्यंत तेज से प्रकाशित होती हैं,
जो अमृत के मंडल का रस पीती हैं और स्वयं अमृतमयी हैं — मैं उस चिदानन्दस्वरूपा भवानी की स्तुति करता हूँ। ॥1॥
जो करोड़ों उगते सूर्य के समान तेजस्वी, लाल वर्ण की अंगों से शोभायमान हैं,
जो सौंदर्य और श्रृंगार से सुसज्जित हैं, महापद्म के केसर के मध्य त्रिकोण रूप में विराजमान हैं —मैं उस रात्रिस्वरूपा श्री भवानी की वंदना करता हूँ। ॥2॥
जिनके चरण कमल रत्नजड़ित कर्णाभूषणों और लाक्षारस के रंग से चमकते हैं,
जिनकी सेवा ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे देवता भी करते हैं —
हे महादेवी! मैं अपने मस्तक पर आपको ध्यायन करता हूँ। ॥3॥
जिनकी लाल रंग की साड़ी, रत्नों से जड़ा हुआ कमरबंद और मनोहारी नितंब हैं,
जिनकी नाभि दक्षिणावर्त है और त्रिवली (तीन पेट की रेखाएँ) शोभायमान हैं —
मैं उन रोमावली युक्त भवानी की पूजा करता हूँ। ॥4॥
जो उत्तुंग मणियों के समान स्तन युगल वाली, कमलनयनी हैं,
जो दूध जैसे सौंदर्य से परिपूर्ण हैं, जिनके मुख पर हरित प्रभा है —मैं उन प्रसन्न मुख वाली देवी की स्तुति करता हूँ। ॥5॥
जिनके हाथों में अग्नि, धनुष, पाश और अंकुश हैं और जो कर्णभूषणों से सुसज्जित हैं, जो ज्वलंत आभूषणों से शोभायमान हैं —मैं उस श्री भवानी का भजन करता हूँ। ॥6॥
जो शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के समान मुखमंडल वाली, शांतस्वरूपा हैं,
जिनके मुख पर रत्नमालाएँ चमकती हैं —
मैं उन अत्यंत प्रसन्न श्री भवानी की स्तुति करता हूँ। ॥7॥
जिनकी नासिका से सौंदर्य झलकता है, कमलपत्र जैसे नेत्र हैं,
जिनके कटाक्ष धन्य और दण्डस्वरूप हैं,
जिनके ललाट पर चंदन और कस्तूरी शोभायमान हैं —मैं उन चमकती हुई भवानी को प्रणाम करता हूँ। ॥8॥
जिनके झूमते हुए कुण्डल, सघन काले बालों में चमकते हैं,
जिनके मुकुट में रत्न और मध्य में चंद्रमा शोभायमान है —मैं उनके दिव्य मस्तक को प्रणाम करता हूँ। ॥9॥
हे माँ! आपका यह स्वरूप प्रसन्नता और चेतना से पूर्ण है,
वह मेरे हृदय कमल में सदैव विराजमान हो —जो मेरी वाणी को तेज और ज्ञान से भर दे। ॥10॥
गणेश और अन्य सभी शक्तियों के समूहों से घिरे हुए,स्फुरणशील चक्रों से प्रकाशित राजराजेश्वरी, त्रिपुरा स्वरूपा देवी —
जो शिव के ऊपर विराजमान हैं, मैं उनका ध्यान करता हूँ। ॥11॥
आप ही सूर्य, अग्नि, चंद्रमा, जल, आकाश, पृथ्वी, वायु और चैतन्य स्वरूपा हैं,आपके अतिरिक्त कोई और प्रकाश नहीं —आप सदा आनंदस्वरूपा हैं। ॥12॥
आप ही गुरु, शिव, शक्ति, माता, पिता, विद्या, बुद्धि,गति और मति हैं —हे देवी! आप ही सब कुछ हैं। ॥13॥
आपका यह महान स्वरूप श्रुतियों और वेदों की पहुँच से परे है,मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ —हे भवानी! मेरी इस अज्ञानवश की गई स्तुति को क्षमा करें। ॥14॥
हे शरणदायिनी, वरणीय, करुणा से परिपूर्ण, स्वर्ण जैसी उदार और पुण्यदायिनी देवी! जो दुर्गम और अपार हैं — गंगाभवसागर से भयभीत मुझको रक्षण करें। आपको बारंबार नमस्कार है। ॥15॥
जो भक्त इस भवानी भुजंग स्तुति का पाठ करता है,उसे भवानी अपना शाश्वत पद, सार, ऐश्वर्य और अष्ट सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। ॥16॥
जो “भवने, भवने, भवने” इस मंत्र को हर्षपूर्वक जपते हैं,
उनके जीवन में न शोक, न मोह, न पाप और न भय आता है —कभी किसी प्रकार का कष्ट उन्हें नहीं होता। ॥17॥
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