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Скачать или смотреть सच्चियाय माता मंदिर ओसियां भाग-1

  • education Hub 088
  • 2026-01-05
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सच्चियाय माता मंदिर ओसियां भाग-1
सच्चियाय माता मंदिर का इतिहासनिर्माण परमार राजा उत्पल देव (उपेंद्र)वास्तुकला: यह मंदिर गुर्जर-प्रतिहार शैलीकुलदेवी: सच्चियाय माता को ओसवाल जैन समुदायreetmains questionsrpse Fastgread# ranasthanpoliceRPSC second gradeall Rajasthan examRajasthan GK
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Описание к видео सच्चियाय माता मंदिर ओसियां भाग-1

राजस्थान कला व संस्कृति#राजस्थान का इतिहास #राजस्थान के मुख्य मदिंरराजस्थान के जोधपुर जिले के ओसियां कस्बे में स्थित सच्चियाय माता मंदिर अपनी प्राचीनता और स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। इसका इतिहास धार्मिक सद्भाव और पौराणिक कथाओं का संगम है:
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और निर्माण
निर्माण: माना जाता है कि मंदिर का निर्माण 9वीं से 10वीं शताब्दी के बीच परमार राजा उत्पल देव (उपेंद्र) ने करवाया था। वर्तमान मंदिर परिसर का अधिकांश हिस्सा 12वीं शताब्दी की वास्तुकला को दर्शाता है।
वास्तुकला: यह मंदिर गुर्जर-प्रतिहार शैली का एक उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर लाल बलुआ पत्थर (Sandstone) से बना है और ऊँची पहाड़ी पर स्थित है, जहाँ पहुँचने के लिए लगभग 150 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।
धार्मिक महत्व
कुलदेवी: सच्चियाय माता को ओसवाल जैन समुदाय, परमार (पंवार) राजपूतों और कई अन्य जातियों की कुलदेवी माना जाता है।
हिंदू-जैन संगम: यह मंदिर हिंदू और जैन दोनों समुदायों के लिए समान रूप से पूजनीय है। जैन परंपराओं के अनुसार, यहाँ पहले देवी चामुंडा का मंदिर था जहाँ पशु बलि दी जाती थी।
पौराणिक कथा और नाम की उत्पत्ति
जैन मान्यता: कहा जाता है कि जैन आचार्य रत्नप्रभसूरी ने राजा के बीमार पुत्र को जीवनदान दिया था। आचार्य के प्रभाव से देवी चामुंडा ने पशु बलि छोड़कर शाकाहार अपनाया। आचार्य ने उन्हें "सच्ची माता" (सच्चियाय माता) नाम दिया, जिसका अर्थ है "सच्ची माँ"।
हिंदू मान्यता: कुछ कथाओं के अनुसार, सच्चियाय माता (इंद्राणी) राजा पौलोमा की पुत्री और देवराज इंद्र की पत्नी थीं।
प्रमुख आकर्षण
स्वयंभू प्रतिमा: मंदिर के गर्भगृह में माता की प्रतिमा कसौटी के काले पत्थर से बनी है, जिसे 'स्वयंभू' (स्वयं प्रकट) माना जाता है।
मूर्तियाँ और नक्काशी: मंदिर की दीवारों पर भगवान विष्णु के वराह अवतार, कृष्ण लीला और अन्य देवी-देवताओं की बारीक नक्काशी की गई है।
मंदिर में नवरात्रि और भाद्रपद के मेलों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

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