श्रीमद्भगवद्गीता का प्रधान विषय: सांख्य योग एवं कर्म योग
श्रीमद्भगवद्गीता, जिसे गीता भी कहा जाता है,
श्रीमद्भगवद्गीता, जिसे गीता भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह महाभारत युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का संग्रह है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् ने भगवत प्राप्तिके लिये मुख्य दो मार्ग बतलाये हैं
श्रीमद्भगवद्गीता का मुख्य विषय "कर्म योग" है, जो मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करने और फल की चिंता किए बिना कर्म करने की शिक्षा देता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् ने भगवत प्राप्तिके लिये मुख्य दो मार्ग बतलाये हैं—एक सांख्य योग, दूसरा कर्म योग।
सांख्य योग वास्तविकता की प्रकृति, मानव अस्तित्व और आध्यात्मिक ज्ञान के मार्ग के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाले विषयों की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। आत्म-ज्ञान - अपने वास्तविक स्वरूप को समझने और शाश्वत आत्मा और अस्थायी भौतिक शरीर के बीच अंतर करने का महत्व। सम्पूर्ण पदार्थ मृगतृष्णा के जलकी भाँति अथवा स्वप्न की सृष्टि के सदृश मायामय होनेसे माया के कार्य रूप सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बर्तते हैं, ऐसे समझकर मन, इन्द्रियों और शरीरद्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन के अभिमान से रहित होना तथा सर्वव्यापी सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपमें एकीभाव से नित्य स्थित रहते हुए एक सच्चिदानन्दघन वासुदेव के सिवाय अन्य किसी के भी होनेपने का भाव न रहना, यह तो सांख्य योग का साधन है| ज्ञानयोग को बुद्धियोग भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ पर बुद्धि का अर्थ है संख्या। अत: जिससे आत्मतत्त्व का दर्शन हो वह सांख्ययोग है। आत्मा एवं शरीर दोनों पृथक्-पृथक् हैं फिर भी अज्ञानी जन शरीर को ही आत्मा मान लेते हैं, अत: शरीर के नाश होने से आत्मा के नाश का ज्ञान कर लेते हैं। सांख्ययोग - सृष्टि के स्रोत का बौद्धिक रूप से पता लगाकर परम सत्ता से जुड़ने की प्रक्रिया। सांख्ययोग से तात्पर्य है "वह योग जो आत्मा, परमात्मा और जड़ वस्तुओं के वैज्ञानिक ज्ञान के बारे में विश्लेषणात्मक ज्ञान देता। सांख्य को जानने से योग की सभी तकनीकें, सभी आसन, प्राणायाम और ध्यान, अर्थ और दिशा से भर जाते हैं। शरीर-मन वह यंत्र है जिसे चेतना बजाना सीखती है। 25 तत्वों में से दो ऐसे स्रोत हैं जिनसे पूरा ब्रह्मांड विकसित होता है: चेतना, या पुरुष, शाश्वत वास्तविकता; और प्रकृति, या प्रकृति, शुद्ध रचनात्मक शक्ति। सांख्य दर्शन में, प्रकृति के तीन गुण बताए गए हैं - सत् , रजस् और तमस्। तमस् गुण के प्रधान होने पर व्यक्ति को सत्य-असत्य का कुछ पता नहीं चलता, यानि वो अज्ञान के अंधकार (तम) में रहता है।
कर्मयोग :
कर्मयोग, भगवत गीता में वर्णित एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जो निष्काम कर्म पर जोर देता है। इसका अर्थ है, बिना किसी फल की इच्छा किए अपने कर्तव्यों का पालन करना। कर्मयोग का उद्देश्य, कर्म के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना है।कर्मयोगी का अर्थ है, "वह व्यक्ति जो कर्म में लीन रहता है और फल की इच्छा किए बिना अपने कर्तव्य का पालन करता है।" इसे कर्म योग के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति भी कहा जा सकता है। सब कुछ भगवान् का समझकर सिद्धि-असिद्धि में समत्वभाव रखते हुए आसक्ति और फल की इच्छा का त्याग कर भगवदाज्ञानुसार केवल भगवान् के ही लिये सब कर्मों का आचरण करना तथा श्रद्धा-भक्ति पूर्वक मन, वाणी और शरीर से सब प्रकार भगवान् के शरण होकर नाम, गुण और प्रभाव सहित उनके स्वरूप का निरन्तर चिन्तन करना, यह कर्म योग का साधन है। कर्म योग मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि मनुष्य को अपने कर्मों के फल की चिंता किए बिना, बिना किसी आसक्ति के कर्म करते रहना चाहिए।
उक्त दोनों साधनों का परिणाम एक होने के कारण वे वास्तवमें अभिन्न माने गये हैं । परन्तु साधन काल में अधिकारी-भेद से दोनों का भेद होनेके कारण दोनों मार्ग भिन्न-भिन्न बतलाये गये हैं । इसलिये एक पुरुष दोनों मार्गों द्वारा एक काल में नहीं चल सकता, जैसे श्रीगङ्गा जी पर जानेके लिये दो मार्ग होते हुए भी एक मनुष्य दोनों मार्गों द्वारा एक कालमें नहीं जा सकता।
उक्त साधनों में कर्मयोग का साधन संन्यास-आश्रम में नहीं बन सकता है, कैसे बन सकता? हाँ, इतनी विशेषता अवश्य है कि सांख्य मार्ग का अधिकारी देहाभिमान से रहित होना चाहिये; क्योंकि जब तक शरीरमें अहंभाव रहता है, तब तक सांख्य योग का साधन भली प्रकार समझमें नहीं आता। इसीसे भगवान् ने सांख्य योगको कठिन बतलाया है तथा (कर्मयोग) साधनमें सुगम होने के कारण अर्जुन के प्रति जगह-जगह कहा है कि तू निरन्तर मेरा चिन्तन करता हुआ कर्मयोग का आचरण कर।
कर्मयोग का मूल सिद्धांत है कि कर्म करते समय फल की इच्छा न की जाए।
अपने धर्म या कर्तव्य का पालन करना, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो, कर्मयोग का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
कर्मों से आसक्ति (मोह) का त्याग करना और मन को समभाव में रखना कर्मयोग का एक आवश्यक अंग है।
कर्मयोग का महत्व:
• कर्मयोग, कर्मों के बंधन से मुक्ति पाने का मार्ग है।
• यह मनुष्य को अपने अहंकार को कम करने और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है।
• कर्मयोग, मनुष्य को जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने में सहायता करता है।
• यह मनुष्य को तनाव और चिंताओं से मुक्ति दिलाता है।
कर्मयोग का अभ्यास:
• अपने कर्तव्यों का पालन करें, बिना किसी फल की इच्छा किए।
• अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करें।
• अपने मन को शांत और स्थिर रखें।
• अपने कर्मों में कुशलता और संतुलन बनाए रखें।
• दूसरों की सेवा करें और उनकी मदद करें।
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