ब्राह्मण कोई जाति नहीं|नर्तकी हिरणी दासी से पैदा प्रसिद्ध ब्राह्मण
यह हिंदू धर्मानुकूल वर्णाश्रम क्रम से सर्वोच्च ब्रा वर्ण है, इस ही को लोगों ने जाति भी मान रफ्खी है। और इस वर्गा के लोगों को ग्राह्मण जाति कहकर भी पुकारते हैं, प्रजापति ब्रह्मा जी के मुखमे उत्पन्न दोने के कारण ब्राह्मण नाम पड़ा, इसकी व्युत्पत्ति ऐसी होती है कि "ब्राह्मणो विप्रस्य प्रजा पत्तेर्वा अपत्त्यम् " अर्थात् जो विप्र प्रजापति की सन्तान हैं, वे ब्राह्मण * कहाये, अथवा "ब्रह्म वेदस्नमधीते स ब्राह्मणः " अर्थात् जो सांगो- पांग वेद को पढ़ाता है वह ग्राह्मण कहाता है। कोपकार ने ब्राह्मण के छः नाम लिखे हैं यथाः-
आश्रमोऽश्री दिजात्यग्र जन्मभूदेव वाड़वाः । • विप्रश्च जाह्मणोऽसौ पटकर्मा यागादिभिर्वृतः ॥
अमर कोप ग्रा० घ० द्वि० कां० लो० ४।
'अर्थ :- द्विज, अग्रजन्मा, भूदेव, वाडव, विप्र और ब्राह्माण ये नाम बाह्मण के हैं। इस दी जाति पर मीमांसा करना है, इसही जाति के कर्तव्याऽकर्तव्य, लत्तण, कर्म्म, धर्म तथा उत्पत्यादि की मीमांसा रूपी यह " ब्राह्मण मीमांसा" ग्रन्थ है । अन्य अन्य कोपों में ग्राह्मण शब्द के पर्यायवाची कई शब्द लिखे हैं यथाः-
शब्द रत्तावलि में लिखा है कि द्विज, सूत्रकण्ठः, ज्येष्ठ वर्णः, अग्र- जातकः, द्विजन्मा, वक्रज, मैत्रः, वेदद्यासः, नयः, गुरुः ये नाम ब्राह्मण * के है, इस ही तरह राज निघंटु में लिखा है कि ब्रह्मा, पटकर्ता, और द्विजोत्तम ये नाम ब्राह्मण के हैं।
ग्राहाण कौन कहाया जा सकता है? क्यों कि मनुष्य शरीर सब एकसे हैं ग्राक्षण के शरीर में ऐसी कौनसी भिक्षता रक्सी गई है
जिस के देखने मात्र से ही ग्रायण जान किया जाय ? अतः जिज्ञासु .. पृछना है कि प्रधिति भगवन्! "को ग्राफयो ? किजीयः ?" कि भग चन् कहिये कि ब्राह्मण कौन है? क्या शरीर में जो जीव है उसे ब्राह्मणा समझना चाहिये ?
उत्तर :- जीयो वाहगा इति चेर्ताह सर्वस्यापि जनस्य जीवस्येंक रुपत्वातस्माज्जीयो ब्राह्मणो न भवत्येव ।
उत्तरः- जीय ब्राह्मण नहीं है, क्यों कि प्रालीमात्र में जीव सब में एकसा है, सब को एकसा सुख दुःख प्रतीत होता है, जीव के जो जक्षण शास्त्र में वर्णित हैं वे सत्र ही जीवों पर एकसे संघटित होते हैं; मनुष्य के जीव में व पशु के जीव में जो भिन्नता है यह केवल इन्द्रीय संसर्ग की है अर्थात् मनुप्य पंच ज्ञानेन्द्रिय व पंच कर्मेन्द्रिय तथा मन इन ग्यारह इन्द्रियों का स्वामी है, तो पशुओं में हानेन्द्रियों का अभाव है, प्रम्यथा क्षत्रिय का जीव, वैश्य का जीव व शूद्र का जीव, तथा महाशुद्र व भंगी तक के जीव में कुछ भी मेद नहीं है, अतः सिद्ध हुवा कि जीय ब्राह्मण नहीं है। वेदान्त विषय को लेने से जीव ओव सब एक हैं, आवागमन के विषय को जेने से भी जीव जीव सब एक ही प्रमाणित होते हैं, इस सब हमारे कथन की पुष्टि में महाभारत में ऐसा प्रमाण मिलता है किः-
सप्तव्याधादशारण्ये मृगाः कालिंजले गिरौ । चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे ।। तेऽपिजाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
हस्तिन्या मचलो जाता उलूक्यां केशपिंगलः अगस्त्योऽगस्तिपुष्पाच्चः कोशिकाः कुशिसम्भवः कपिलः कपिलाज्जातः शल्युल्माच्च गौतमः । द्रोणा चार्यास्तु कलशा, तित्तिरीस्तित्तिरी सुतः रेणुकाऽजनयद्रामः मृष्यश्रृंगमुनिं मृगी ।। कैवर्तिन्य जनद्व्यास कौशिकं चैव शुद्रिकाः। विश्वामित्रंच चाण्डाली वशिष्ठ चैव उर्वशी ।। नतेपां ब्राह्मणी माता लोका चाराच ब्राह्मणः ।।
प्यर्थ-श्रचजमुनि हथनी के पेट से पैदा हुये, अगस्त्य ऋषि अगस्ति के फूल से, फौशिक ऋषि कुशा घास से, कविज मुनि बंदी में, गौतम मुनि शालगुल्म नामक वल्जि से, द्रोणाचार्य जी द्रोण से, तित्तिर- ऋषि तित्तरी से, परशुराम जी महाराज ग्गणुका नाम धूल से, श्रृंगी. ऋषि हिरनी से, व्यास जी महाराज कोलनी से।
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