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Скачать или смотреть चार युग = चार चतुर्थांश 1,2,3........ ♾️

  • परम सत्य का पथ
  • 2025-10-02
  • 28
चार युग = चार चतुर्थांश 1,2,3........ ♾️
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Описание к видео चार युग = चार चतुर्थांश 1,2,3........ ♾️

चारों युग (सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग) की अपनी-अपनी विशेषताएँ बताई गई हैं। सनातन धर्म के ग्रंथों में इनकी विस्तार से व्याख्या मिलती है।

1. सत्ययुग
यह पहला और सबसे श्रेष्ठ युग माना जाता है।

धर्म के चारों स्तंभ (सत्य, तप, दया और शौच) पूर्ण रूप से स्थिर रहते हैं।

मनुष्य की आयु बहुत लंबी (हजारों वर्ष) होती है।

मनुष्य सत्यप्रिय, निष्कपट और धर्मनिष्ठ होते हैं।

प्रकृति संतुलित रहती है, कोई दुख, रोग या पाप नहीं होता।

भगवान विष्णु ने मत्स्य, कूर्म, वराह और नृसिंह अवतार इसी युग में लिए।

2. त्रेतायुग
धर्म के चार में से तीन स्तंभ ही स्थिर रहते हैं (सत्य थोड़ा घट जाता है)।

मनुष्य की आयु सत्ययुग से कम (सैकड़ों वर्षों) की होती है।

पाप और अधर्म की प्रवृत्ति आरंभ होती है।

यज्ञ और तपस्या का महत्व अधिक रहता है।

इस युग में भगवान विष्णु ने वामन, परशुराम और श्रीराम अवतार लिए।

रावण का वध और धर्म की स्थापना इसी युग में हुई।

3. द्वापरयुग
धर्म के केवल दो स्तंभ ही स्थिर रहते हैं।

पाप और अधर्म बढ़ने लगता है, झूठ और अन्याय का प्रचलन बढ़ता है।

मनुष्य की आयु और भी कम हो जाती है।

यज्ञों का महत्व कम होकर केवल पूजा और भक्ति का महत्व बढ़ने लगता है।

इस युग में महाभारत युद्ध हुआ।

भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण और बलराम अवतार लिए।

श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया।

4. कलियुग
धर्म का केवल एक स्तंभ (सत्य) ही बचा रहता है।

पाप, अधर्म, कलह, झूठ, लोभ, ईर्ष्या, हिंसा आदि का प्रबल प्रभाव रहता है।

मनुष्य की आयु बहुत कम (100 वर्ष से भी कम) हो जाती है।

धन, भौतिक सुख और स्वार्थ प्रमुख बन जाते हैं।

संत महात्मा, भक्ति और नामस्मरण ही मुक्ति का मार्ग बताते हैं।

इस युग में भगवान विष्णु कल्कि अवतार लेकर अधर्म का अंत करेंगे।

👉 संक्षेप में:

सत्ययुग → धर्म पूर्ण, आयु लंबी, पाप नहीं।

त्रेतायुग → धर्म घटा, पाप प्रारंभ, राम अवतार।

द्वापरयुग → धर्म आधा, अधर्म बढ़ा, कृष्ण अवतार।

कलियुग → धर्म न्यूनतम, पाप प्रबल, कल्कि अवतार की प्रतीक्षा।

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