Ram bhakti @bhaktimeshakti2281
परम पूज्य डाक्टर श्री विश्वामित्र जी महाराज जी के मुखारविंद से
((1872))
श्री भक्ति प्रकाश भाग [866]
(सिमरन एवं सेवा )भाग ७
बच्चों पर चर्चा भाग ७
ऋषि उद्दालक
ऋषि उद्दालक इस वक्त महर्षि हैं । आइए साधक जनों इनके जीवन से देखते हैं क्या सीखने को मिलता है । बहुत बड़ा आश्रम। अनेक सारे शिष्य । एक शिष्य को आज एक किशमिश का दाना दिया है । कहा वत्स मेरे मित्र हैं उषस्ति ऋषि । उनके पास जाओ, जाकर उनको एक किशमिश का दाना देना। कहना अपने सभी आश्रम वासियों को बांटकर, जो बाकी बचे, स्वयं भोग लगा
लेना । मेरी तुच्छ भेंट स्वीकार करो । गुरु महाराज की आज्ञा है, सो किंतु परंतु का कोई अर्थ ही नहीं । एक किशमिश का दाना। ना जाने कितने आश्रम वासी होंगे वहां पर । एक महर्षि, दूसरे महर्षि को पहुंचा रहे हैं, एक किशमिश का दाना । इस शिष्य ने किंतु परंतु कुछ नहीं किया । जो आज्ञा गुरु महाराज । एक किशमिश का दाना लेकर महर्षि उषस्ति के पास पहुंच गया हैं ।
जाकर कहा -महाराज श्री, महर्षि उद्दालक जी ने यह आपके लिए भेंट और यह संदेश दिया है । शिष्य वहां बैठे हुए थे उषस्ति ऋषि के । शिष्य आग बबूला हो गए । हमारे गुरु महाराज का अपमान कर दिया । एक किशमिश का दाना कैसे सब को बांटा जाएगा, और यह भी कहा है सबको खिला कर तो स्वयं भोग लगाना । कैसे हो सकता है यह ? महर्षि उषस्ति उस किशमिश के दाने को लेकर तो अपने माथे पर लगाते हैं । महर्षि के घर से आया है । कहा वत्स, अपने शिष्यों को, जो लेकर आया है उसे बिठा लिया । अपने शिष्यों को कहा जो आज ठंडाई बन रही है, इसे पीसकर उसमें मिला दो । अच्छी तरह घोलना । वह सब को मिलेगी । जो बाकी बचेगी, थोड़ी मुझे भी पिला देना । एक किशमिश का दाना सबको बंट गया । यह उपदेश सिर्फ बच्चों के लिए ही नहीं है । यह हम युवकों के लिए, बुजुर्गों के लिए सबके लिए है ।
भक्त हैं उनके लिए भी, अभक्त हैं उनके लिए भी, सबके लिए । एक किशमिश का दाना सारे आश्रम वासियों को बंट गया और महर्षि उषस्ति ने स्वयं भी उसका प्रसाद पा लिया । महर्षि उषस्ति कहते हैं बेटा जो लेकर आया है संदेश, खाली हाथ नहीं जाना । हवन सामग्री पड़ी हुई थी, उसमें से एक तिल का दाना उठाया;
देखो संतों महात्माओं की शिक्षाएं, कैसे अपनी जिंदगी के अनुभव हम तक पहुंचाएं हैं । एक देवी तिल का दाना हवन सामग्री से उठाया, कहा जाकर महर्षि उद्दालक को कहना, यह इसकी सुगंध सारे आश्रम वासियों को ही नहीं, सारे संसार तक पहुंचे । कोई प्राणी, कोई देवी-देवता, इस ब्रह्मांड में इसकी सुगंध से वंचित ना रहे, इसकी सुबास से वंचित ना रहे ।
एक तिल का दाना लेकर महर्षि उद्दालक के पास पहुंचे हैं । भेंट दी । महर्षि उषस्ति ने आपके लिए भेंट भेजी है । माथे पर लगाई। उधर उन्होंने माथे पर लगाई थी इधर इन्होंने तिल का दाना माथे पर लगाया है ।
हवन का समय था, चले गए सब को लेकर। हवन कुंड के पास क्या कहा है,
वहां पर जाकर कहा सभी देवी देवताओं का मुख है, अग्निदेव जो इनके मुख् में चला जाएगा, अर्थात सभी के मुख् में चला जाएगा। अतएव उस तिल के दाने को अग्नि में डाल दिया । सारी की सारी हवन सामग्री की महक, उस तिल की भी जो महक होगी, सारे आश्रम में फैल गई । जहां जहां कहीं वह महक जा सकती थी, जहां जहां कहीं वह सुगंध जा सकती थी, वहां वहां
पहुंच गई ।
संत महात्मा दोनों के दोनों अपने शिष्यों को समझाते हैं -बेटा जिंदगी में जो कुछ भी मिले, या जो कुछ पास हो, यदि उसे औरों को बांटते रहोगे, तो आपके कर्म पूजा बन जाएंगे । अपने पास रखोगे तो गल सड़ जाओगे । जो कुछ भी तुम्हारे पास है शुभ, उसे बांटना औरों को, आनंद ही आनंद मिलेगा । यह कल्याणकारी मार्ग है औरों को बांटना । ज्ञान है ज्ञान बांटो, सुख है सुख बांटो, प्रेम है प्रेम बांटो ।
भक्तजनों किसी के अंदर किसी चीज की कमी नहीं है । कंजूसी मत करिएगा । कंजूसी करोगे तो आपके अपने गुण ही सड़ांध बन जाएंगे । तालाब किसी को कुछ दे नहीं सकता तो मच्छर पलते हैं उस तालाब में । सारे का सारा तालाब गंदा हो जाता है। क्यों ?
संत महात्मा कहते हैं उसने जिंदगी में बांटना नहीं सीखा, किसी को कुछ देना नहीं सीखा। बहुत सुंदर उपदेश साधक जनो हर एक के जीवन में उतारने योग्य । हां, देने से पहले यह तो चाहोगे ना, जो देना है पहले मेरे अंदर वह चीज आए, तभी बांटोगे ना ।
यदि अंदर है ही नहीं, तो फिर बांटोगे क्या ? प्रेम बांटना है, सुख बांटना है, आनंद बांटना है, तो जिनके पास है, उनके साथ जुड़ कर रहोगे तो प्रवाह बना रहेगा । वह सब चीजें आपके अंदर आती जाएंगी और आप आगे उन्हें बांटते जाओ, बांटते जाओ, बांटते जाओ, बांटते जाओ और वह प्रवाह Seamless way बना रहेगा । उस प्रवाह को कोई रोकने वाला नहीं है, वह स्रोत से आ रहा है ।
बच्चे लोगों, युवकों, कल आपसे अर्ज की जा रही थी, अपने माता पिता की इज्जत करना, तो परमात्मा आपकी इज्जत करेगा। अपने माता पिता की सेवा करना, तो आप परमात्मा के प्यारे बन जाओगे । अपने माता पिता की सेवा ऐसे करना, जैसे परमात्मा की कर रहे हो, तो परमात्मा इस सेवा को अपनी सेवा मानेगा ।
जो साधक बाहर से आए हैं, वह तो चले जाएंगे । जो साधक बच्चे लोग, युवक यदि कल सुबह आ सके 7:00 से 8:00 बजे तो कल साधक जनो बच्चों के लिए यह चर्चा जारी रखेंगे । आज शुरू कर देते हैं ।
एक स्कूल है । वहां क्या नियम है, कई सारे नियम । जहां अच्छे बालक होते हैं वहां शरारती बच्चे भी होते हैं । आज एक हट्टा-कट्टा बच्चा, बालक, स्कूल का दादा, जिस किसी को मन करता है, पीटता है । आज एक बड़े मासूम से बच्चे, चिट्टे गोरे बच्चे को, विदेश की बात है, पीट रहा है ।
हाथ में छड़ी होती थी । उसका नियम था इस प्रकार का, हाथ में छड़ी होती थी । छड़ी से पीटता था । बिन वजह कोई कारण नहीं। आज एक बेटा दूसरा बच्चा भी बाहर निकला है । बहुत दुबला पतला है, चिट्टा गोरा है । उसने,
इसके साथ मुंह लगाने की कोई हिम्मत नहीं करता था,
आज उसने हिम्मत की पूछा -भैया क्या बिगाड़ा है इस
Информация по комментариям в разработке