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( स्थायी मुखड़ा):
घट-घट में राम बसे, तू मंदिर क्यों जाए रे,
खोज लिया जो भीतर खुद को, फिर कौन पराया रे।
(अंतरा 1:)
माला फेरत जुग बीत गयो, मन का फेर न फेर,
मन का कंकर दूर हुआ ना, कैसे हो उजियेर।
बाहर ढूंढे तू भगवान को, भीतर अंधियारा रे,
घट-घट में राम बसे, तू मंदिर क्यों जाए रे।
(अंतरा 2:)
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित हुआ न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, जो जाने सोई होय।
ज्ञान का घमंड छोड़ दे बंदे, प्रेम का दीप जलाए रे,
घट-घट में राम बसे, तू मंदिर क्यों जाए रे।
(अंतरा 3:)
जाति-पाति के फेर में पड़कर, सच को तू बिसराय,
एक ही मिट्टी से उपजे, फिर कैसा ऊँच-निच ठहराय।
ना ब्राह्मण ना शूद्र यहाँ कोई, सब एक साँस के साए रे,
घट-घट में राम बसे, तू मंदिर क्यों जाए रे।
(अंतरा 4:)
धन का मद और तन की माया, सब सपना संसार,
आज है तेरा, कल नहीं होगा, झूठा यह विस्तार।
नाम सुमिरन कर ले प्राणी, यही सच्चा सहारा रे,
घट-घट में राम बसे, तू मंदिर क्यों जाए रे।
(अंतरा 5 कबीर वाणी भाव):
कबीरा कहे सुनो रे प्राणी, साँस-साँस में राम,
मरण से पहले मर के देखो, तभी मिले विश्राम।
जो खुद को पहचान गया है, वही सच्चा ज्ञानी रे,
घट-घट में राम बसे, तू मंदिर क्यों जाए रे।
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